Shri Swami Narottamanand Giri Ved Vidyalaya

श्री स्वामी नरोत्तमानंद गिरि वेद विद्यालय

चत्वारो वेदाः साङ्गा सरहस्या बहुधा भिन्नाः एकशतमध्वर्युशाखाः।
सहस्रवर्त्मा सामवेदः एकविंशतिधा बाह्वृच्यम्, नवधाऽथर्वणो वेदः।।

The four Vedas, along with their auxiliary disciplines and esoteric knowledge, are divided into many branches. The Yajurveda has 101 branches, the Samaveda has 1,000 branches, the Rigveda has 21 branches, and the Atharvaveda has 9 branches.

Learn More

हमारे वेद विद्यालय में आपका स्वागत है

प्राचीन वैदिक ज्ञान, गुरु-शिष्य परंपरा एवं आधुनिक शिक्षा के समन्वय से विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास की दिशा में समर्पित एक विशिष्ट गुरुकुल।

🕉️

एक परिचय

श्री स्वामी नरोत्तमानन्द गिरि वेद विद्यालय वैदिक शिक्षा, संस्कृत एवं आधुनिक विषयों के समन्वय के साथ विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए समर्पित गुरुकुल परंपरा पर आधारित शिक्षण संस्था है।

🛕

इतिहास एवं स्थापना

विद्यालय की स्थापना गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर 07 जुलाई 1999 को ब्रह्मलीन श्री 108 स्वामी शारदानन्द गिरि जी महाराज द्वारा अपने गुरु ब्रह्मलीन श्री स्वामी नरोत्तमानन्द गिरि जी महाराज की स्मृति में की गई।

🌿

सांस्कृतिक एवं समग्र विकास

यहाँ विद्यार्थियों को वेद अध्ययन के साथ खेल-कूद, योग, ध्यान, पेंटिंग, बागवानी तथा अन्य व्यावहारिक गतिविधियों के माध्यम से शारीरिक, मानसिक एवं सांस्कृतिक विकास का अवसर प्रदान किया जाता है।

💻

आधुनिक शिक्षा एवं सुविधाएँ

वैदिक शिक्षा के साथ विद्यार्थियों को संस्कृत, अंग्रेजी, गणित, सामाजिक विषयों एवं कंप्यूटर का अध्ययन कराया जाता है, जिससे वे प्राचीन परंपरा के साथ आधुनिक ज्ञान से भी परिचित हो सकें।

📜

वैदिक सस्वर उच्चारण परंपरा

वेद विद्या की मूल श्रुति परंपरा में गुरु के मुख से मंत्रों को सुनकर, उनका अनुकरण करते हुए बार-बार अभ्यास एवं आवृत्ति द्वारा विद्यार्थियों को वेद मंत्रों का शुद्ध उच्चारण एवं स्मरण कराया जाता है।

🥗

संयमित एवं सात्त्विक आहार

विद्यार्थियों के लिए विद्यालय की पाकशाला में निर्धारित मीनू के अनुसार पौष्टिक एवं सात्त्विक भोजन तैयार किया जाता है, जिसमें मौसमी सब्जियाँ, दालें, फल एवं अन्य पौष्टिक आहार सम्मिलित होते हैं।

एक परिचय

श्री स्वामी नरोत्तमानन्द गिरि वेद विद्यालय श्री परमानन्द आश्रम ट्रस्ट की वैदिक परंपरा एवं संस्कृत शिक्षा की समृद्ध परंपरा को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से संचालित गुरुकुल है।

वर्तमान समय में संस्था के अध्यक्ष श्री स्वामी विद्याधीशानन्द गिरि जी महाराज हैं। संस्था के उपाध्यक्ष श्री स्वामी शरद पुरी जी महाराज के कुशल मार्गदर्शन में शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार के सहयोग से विद्यालय का संचालन किया जा रहा है।

विद्यालय में लगभग 60 वेदपाठी छात्र वेदों का अध्ययन कर रहे हैं। विद्यार्थियों को ऋग्वेद, शुक्लयजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद के साथ-साथ संस्कृत, अंग्रेजी, गणित एवं सामाजिक विषयों की शिक्षा भी प्रदान की जाती है।

प्रयागराज जिले में यह एक विशिष्ट पाठशाला है जहाँ चारों वेदों के अध्ययन की व्यवस्था उपलब्ध है। विद्यालय का उद्देश्य विद्यार्थियों को अपनी प्राचीन वैदिक परंपरा से जोड़ते हुए उन्हें आधुनिक जीवन की आवश्यकताओं के अनुरूप भी सक्षम बनाना है।

इतिहास एवं स्थापना

श्री स्वामी नरोत्तमानन्द गिरि वेद विद्यालय की स्थापना श्री परमानन्द आश्रम ट्रस्ट के पूर्व अध्यक्ष परमवीतराग धर्मालंकार यतिसम्राट सांख्ययोगवेदांताचार्य सन्तशिरोमणि परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन श्री 108 स्वामी शारदानन्द गिरि जी महाराज द्वारा गुरु पूर्णिमा के अवसर पर दिनांक 07.07.1999 को अपने गुरु ब्रह्मलीन श्री स्वामी नरोत्तमानन्द गिरि जी महाराज की स्मृति में की गई।

वेद विद्यालय को महर्षि सान्दीपनि राष्ट्रीय वेदविद्या प्रतिष्ठान, उज्जैन (म.प्र.) से दिनांक 01.04.2001 से “वैदिक सस्वर उच्चारण की मौखिक परम्परा को अक्षुण्ण बनाए रखने की योजना” के अन्तर्गत इकाई के रूप में मान्यता प्रदान की गई।

प्रतिष्ठान द्वारा वेद के प्रचार-प्रसार तथा इसके संरक्षण एवं संवर्धन के लक्ष्यों को सफलतापूर्वक आगे बढ़ाते हुए विद्यालय ने निरंतर प्रगति की। तीन वर्षों के बाद संस्था का सम्यक् आकलन किया गया और महर्षि सान्दीपनि राष्ट्रीय वेदविद्या प्रतिष्ठान, उज्जैन द्वारा वर्ष 2004-2005 से विद्यालय को पाठशाला योजना में सम्मिलित किया गया।

इस प्रकार विद्यालय ने अपनी स्थापना से लेकर आज तक वैदिक शिक्षा एवं गुरु-शिष्य परंपरा के संरक्षण और संवर्धन की दिशा में निरंतर कार्य किया है।

सांस्कृतिक एवं समग्र विकास

संस्था की कोशिश है कि यहाँ पढ़ने वाले वेद छात्र अपनी प्राचीन परंपरा और आधुनिक जीवन दोनों को समझ सकें। इसी उद्देश्य से वेद अध्ययन के साथ विद्यार्थियों को विभिन्न सांस्कृतिक एवं व्यावहारिक गतिविधियों से जोड़ा जाता है।

विद्यार्थी केवल वेदों का अध्ययन ही नहीं करते, बल्कि खेल-कूद, पेंटिंग, बागवानी एवं अन्य व्यावहारिक प्रशिक्षण भी प्राप्त करते हैं।

विद्यार्थियों के शारीरिक विकास के लिए क्रिकेट, कबड्डी एवं बैडमिंटन जैसे खेलों का आयोजन किया जाता है। इससे उनमें अनुशासन, सहयोग, नेतृत्व एवं स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की भावना विकसित होती है।

योग एवं ध्यान के माध्यम से विद्यार्थियों को अपने मन को एकाग्र एवं शांत रखने का अभ्यास कराया जाता है। गुरुकुल जीवन का उद्देश्य केवल शैक्षणिक ज्ञान देना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों के शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक एवं सांस्कृतिक व्यक्तित्व का समग्र विकास करना है।

विद्यालय में विद्यार्थी प्राकृतिक वातावरण में रहते हुए अध्ययन करते हैं और अपने दैनिक जीवन में संयम, अनुशासन एवं आत्मनिर्भरता जैसे मूल्यों को अपनाते हैं।

आधुनिक शिक्षा एवं सुविधाएँ

विद्यालय में वैदिक शिक्षा के साथ विद्यार्थियों को आधुनिक विषयों का अध्ययन कराया जाता है। छात्रों को संस्कृत, अंग्रेजी, गणित एवं सामाजिक विषयों की शिक्षा प्रदान की जाती है।

प्राचीन परंपरा एवं आधुनिक ज्ञान के बीच संतुलन स्थापित करने के उद्देश्य से विद्यार्थियों को कंप्यूटर का प्रशिक्षण भी दिया जाता है।

केंद्र सरकार के Skill India कार्यक्रम के अंतर्गत यहाँ वेद शास्त्र प्रवचन एवं पौरोहित्य प्रशिक्षण के अंतर्गत डिप्लोमा पाठ्यक्रम भी कराया जाता है।

विद्यालय का प्रयास है कि वैदिक शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थी आधुनिक समाज की आवश्यकताओं को भी समझें तथा अपने ज्ञान और कौशल के माध्यम से समाज में सार्थक योगदान देने में सक्षम बनें।

गुरुकुल व्यवस्था के अंतर्गत विद्यार्थियों के अध्ययन काल तक विद्यालय छात्रावास में रहने की व्यवस्था है। उन्हें निःशुल्क भोजन, आवास, दैनिक उपयोग की सामग्री, पुस्तकें, कॉपी, पेन, वस्त्र एवं शीतकालीन ऊनी वस्त्र आदि प्रदान किए जाते हैं।

वैदिक सस्वर उच्चारण परंपरा

प्राचीन भारतीय शिक्षा का उदय वेदों से माना जाता है। वेद विद्या मूलतः श्रौत विद्या है, जिसमें ज्ञान को गुरु से शिष्य तक मौखिक परंपरा के माध्यम से सुरक्षित रखा जाता है।

श्रुति परंपरा के अंतर्गत गुरु के मुख से निकले मंत्रों के उच्चारण को सुनकर शिष्य उनका अनुकरण करता है। वेद मंत्रों को गुरुमुख से सुनकर, बार-बार आवृत्ति एवं अभ्यास द्वारा स्मरण किया जाता है।

यह परंपरा हजारों वर्षों से मौखिक रूप में जीवित रही है और आज भी भारत की पारंपरिक वेद पाठशालाओं में गुरु-शिष्य परंपरा के रूप में निरंतर आगे बढ़ रही है।

वेद मंत्रों के अध्ययन के लिए विद्यार्थियों का चित्त अत्यंत एकाग्र एवं शांत रहना आवश्यक है। इसी कारण गुरुकुल जीवन में मोबाइल, टीवी और सोशल मीडिया जैसे ध्यान भंग करने वाले साधनों से दूरी रखी जाती है।

विद्यार्थी प्रतिदिन सूर्योदय से पूर्व जागकर ध्यान, प्राणायाम एवं संध्या पूजन के माध्यम से अपने मन और मस्तिष्क को एकाग्र करने का अभ्यास करते हैं।

कक्षा में विद्यार्थी गुरु के समक्ष मंत्र को सुनते हैं और गुरु के साथ उसका उच्चारण भी करते हैं। सुनने एवं बोलने की यह संयुक्त प्रक्रिया मंत्रों के स्मरण को अधिक स्थायी बनाने में सहायक होती है।

संयमित एवं सात्त्विक आहार

वेद छात्र संयमित एवं सात्त्विक आहार ग्रहण करते हैं। विद्यालय की पाकशाला में विद्यार्थियों के लिए निर्धारित मीनू के अनुसार पौष्टिक भोजन तैयार किया जाता है।

भोजन में मुख्य रूप से मौसमी हरी सब्जियाँ, विभिन्न प्रकार की दालें तथा हल्के मसालों से तैयार किए गए पौष्टिक व्यंजन सम्मिलित होते हैं। सात्त्विक एवं संतुलित आहार विद्यार्थियों के स्वस्थ एवं अनुशासित जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

विद्यार्थियों के पोषण का विशेष ध्यान रखते हुए सुबह एवं शाम फल, अंकुरित मूंग तथा चना जैसे पौष्टिक आहार भी दिए जाते हैं।

रात्रि में स्वाध्याय के पश्चात विद्यार्थियों को दूध दिया जाता है। पूरे दिन मंत्रोच्चारण एवं अध्ययन करने वाले विद्यार्थियों के लिए यह संतुलित आहार उनकी दैनिक दिनचर्या का महत्वपूर्ण अंग है।

गुरुकुल जीवन में आहार को केवल भोजन के रूप में नहीं, बल्कि स्वस्थ शरीर, शांत मन एवं नियमित जीवनचर्या के आधार के रूप में देखा जाता है।

परम पूज्य स्वामी विद्याधीशानन्द गिरि जी

परम पूज्य स्वामी विद्याधीशानन्द गिरि जी

अध्यक्ष परिचय

परम पूज्य स्वामी विद्याधीशानन्द गिरि जी एक उच्च पदस्थ वैदिक संन्यासी, प्रकांड विद्वान एवं आध्यात्मिक मार्गदर्शक हैं, जो प्राचीन हिमालयी ज्ञान और आधुनिक विश्व के बीच एक सेतु का कार्य कर रहे हैं।

आध्यात्मिक परंपरा: स्वामी जी आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित प्रतिष्ठित 'गिरि' संन्यास परंपरा से संबद्ध हैं। उन्हें गहन ध्यान-साधना, पारंपरिक संस्कृत पांडित्य और हिमालयी योग प्रणालियों के प्रामाणिक ज्ञान के लिए जाना जाता है।

संस्थापक एवं प्रमुख: वे हंसवेद मिशन (Hansavedas Mission) के प्रमुख हैं तथा संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) में स्थित गैर-लाभकारी आध्यात्मिक संस्था 'सेल्फ इन्क्वायरी लाइफ फेलोशिप' (Self Enquiry Life Fellowship) के संस्थापक संन्यासी हैं।

दर्शन एवं उद्देश्य: स्वामी जी प्राचीन वैदिक ग्रंथों, उपनिषदों, क्रियायोग एवं ध्यान की गूढ़ परंपराओं को आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ प्रस्तुत करते हैं। उनका उद्देश्य वैश्विक स्तर पर साधकों को आत्म-साक्षात्कार एवं समग्र जीवन जीने की प्रेरणा प्रदान करना है।